करवा चौथ का पर्व हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ व्रत रखती हैं। इस दिन महिलाएं सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत करती हैं और शाम को चौथ माता, मां गौरी तथा भगवान गणेश की पूजा करती हैं। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। इस साल करवा चौथ का पर्व 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार को मनाया जा रहा है।
हिंदू पंचांग के अनुसार, करवा चौथ की चतुर्थी तिथि 29 अक्टूबर को रात 1 बजकर 6 मिनट पर शुरू हुई और रात 10 बजकर 9 मिनट पर समाप्त होगी। इस दिन पूजा के शुभ मुहूर्त और चंद्रोदय का विशेष महत्व है। लखनऊ में चंद्रोदय का अनुमानित समय रात 8 बजकर 6 मिनट बताया गया है। हालांकि, अलग-अलग शहरों में चांद निकलने का समय अलग हो सकता है। इसलिए व्रत रखने वाली महिलाओं को अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार चंद्रोदय का समय देखना चाहिए।

करवा चौथ के दिन सुबह सरगी ग्रहण करने के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है। परंपरा के अनुसार, कई परिवारों में सास अपनी बहू को सरगी देती हैं। इसके बाद महिलाएं दिनभर निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को पारंपरिक वस्त्र पहनकर सोलह श्रृंगार करती हैं। पूजा के दौरान रोली, अक्षत, फूल, धूप-दीप, नैवेद्य और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। इसके बाद चौथ माता की कथा सुनी जाती है और आरती की जाती है। रात में चंद्रमा के दर्शन होने पर अर्घ्य दिया जाता है और फिर पति के हाथों जल ग्रहण करके व्रत खोला जाता है।
करवा चौथ पर सोलह श्रृंगार का भी विशेष महत्व माना जाता है। महिलाएं बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, मांगटीका, काजल, मंगलसूत्र, चूड़ियां, झुमके, अंगूठी, पायल और बिछिया जैसे आभूषणों से श्रृंगार करती हैं। इसके अलावा सुंदर वस्त्र, गजरा और इत्र का भी इस्तेमाल किया जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, सोलह श्रृंगार को सुहाग, सौभाग्य और वैवाहिक जीवन की खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, श्रृंगार की परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में भिन्न हो सकती हैं।

करवा चौथ की पौराणिक कथा वीरवती नाम की एक महिला से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, एक साहूकार की बेटी वीरवती ने अपने पति की लंबी उम्र की कामना के साथ करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा था। दिनभर भूखी-प्यासी रहने के कारण वह शाम तक काफी व्याकुल हो गई। उसकी परेशानी देखकर उसके सात भाइयों ने पेड़ की आड़ में रोशनी करके ऐसा दृश्य बनाया, मानो चंद्रमा निकल आया हो। वीरवती ने उसे चंद्रमा समझकर अर्घ्य दिया और भोजन कर लिया। कथा के अनुसार, व्रत अधूरा रह जाने के कारण उसे कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। बाद में उसने पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत किया, जिसके फलस्वरूप उसे अपने पति की प्राप्ति हुई। इस कथा को करवा चौथ के अवसर पर श्रद्धा और विश्वास के साथ सुनने की परंपरा है।
करवा चौथ केवल उपवास का पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और पारिवारिक परंपराओं से जुड़ा त्योहार भी है। इस दिन महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। पूजा, कथा, सरगी, सोलह श्रृंगार और चंद्र दर्शन इस पर्व के प्रमुख अंग हैं। निर्जला व्रत स्वास्थ्य के अनुकूल न होने पर अपनी सेहत को प्राथमिकता देना जरूरी है। गर्भवती, स्तनपान कराने वाली या किसी बीमारी से पीड़ित महिलाओं को व्रत रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।



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