प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में एसआरसीसी (SRCC) के एक कार्यक्रम के दौरान 'दिमागी नक्सल' (Dimagi Naxal) टिप्पणी का जिक्र किए जाने पर विवाद खड़ा हो गया है। इस बयान को लेकर सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है।
सीजेपी ने प्रधानमंत्री को सलाह दी है कि वे इस तरह के विभाजनकारी शब्दों का इस्तेमाल करने के बजाय देश में सकारात्मकता और उम्मीद का संचार करें। संगठन का मानना है कि इस तरह के 'लेबल' लगाने से समाज में दूरियां बढ़ती हैं और यह देश के लिए हितकर नहीं है।
क्या है पूरा मामला?
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में 'दिमागी नक्सल' शब्द का प्रयोग किया था, जिसे लेकर विपक्षी दलों और नागरिक समाज के संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। सीजेपी ने इस टिप्पणी को अनावश्यक और समाज को बांटने वाला बताया है। संगठन ने जोर देकर कहा कि एक उच्च पद पर बैठे व्यक्ति को ऐसे शब्दों से बचना चाहिए जो किसी विशेष वर्ग को निशाना बनाते हों या उन्हें अपमानित करते हों।
सीजेपी की नसीहत
सीजेपी ने अपने बयान में कहा कि देश के युवाओं और नागरिकों को ऐसे बयानों की नहीं, बल्कि विकास, रोजगार और बेहतर भविष्य की उम्मीदों की जरूरत है। संगठन ने स्पष्ट किया कि 'दिमागी नक्सल' जैसे शब्दों का प्रयोग करके केवल वैचारिक मतभेदों को और गहरा किया जा रहा है, जबकि वर्तमान समय में देश को एकजुटता की आवश्यकता है।
यह पहली बार नहीं है जब इस तरह की शब्दावली को लेकर राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ी हो। हालांकि, सीजेपी का यह रुख इस बात को रेखांकित करता है कि नागरिक समाज अब सार्वजनिक मंचों पर इस्तेमाल की जाने वाली भाषा को लेकर अधिक सतर्क और मुखर हो रहा है।
फिलहाल, इस मामले पर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर इस पर बहस तेज हो गई है।